411/ 2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हो न जगत में पाप, निर्मल मन हो आदमी।
नहीं सताए ताप,अच्छे ही सब काम हों।
खिलते नहीं सरोज,निर्मल सलिल तड़ाग में।
सावन या आसोज, पंक सदा अनिवार्य है।।
निर्मल कितने लोग,चला खोजने धरणि में।
मिला स्वयं में रोग,निज ग्रीवा में झाँकता।।
करे जगत में काम, मन -मंदिर निर्मल बना।
दिखें हृदय में राम, सब ही लगते देवता।।
जातक निर्मल एक,शिशु अबोध होता भले।
तजे न बुद्धि विवेक, कपट पाप से दूर हो।
जगे न मन में पाप,निर्मल हों यदि भाव तो।
दे न उसे संताप, माता- भगिनी ही दिखे।।
रहते एक न शेष, झगड़े-झंझट लेश भी।
निर्मल तन-मन वेश,मन होता यदि जीव का।।
रहता सदा निवास,निर्मल मन में देव का।
कलुष भरा हो खास, दानव होता आदमी।।
सुता-वधू को सास, एक तराजू में रखें।
कलह न हो गृह -वास,निर्मल हों उर भाव जो।।
निर्मल हों यदि तत्त्व,फल सब्जी या अन्न में।
बरसे अमृत सत्त्व, रोग न आए गेह में।।
भर लें निज संसार, आओ निर्मल भाव से।
करता 'शुभम्' विचार,पाप ताप सब नष्ट हों।।
शुभमस्तु !
07.08.2025●5.00 प०मा०
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