शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

बालक [ कुण्डलिया ]

 477/2025


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

बालक   हैं  संसार  की, इस पीढ़ी के  बीज।

बढ़ते  जो  निज  गेह में,कभी न होते  छीज।।

कभी  न  होते  छीज,निरंतर विकसित  होते।

क्रीड़ा  में   रह  नित्य,  कभी  हैं हँसते - रोते।।

'शुभम्' मातु का नेह,जनक के कुल संचालक।

नई  फसल के  धान,आज  के नन्हे  बालक।।


                         -2-

बालक    हों  जिस   गेह  में, रहती  है  समृद्धि।

खुशियों  की  बरसात हो,होती सुख की वृद्धि।।

होती  सुख   की  वृद्धि,विकसती निर्मल धारा।

शोभित  सूरज  सोम, शून्य  में शुभद  सितारा।।

'शुभम्'  समझ  कर्तव्य,सँभालें संतति पालक।

होता  है  गृह  भव्य, अगर  हों अच्छे   बालक।।


                         -3-

बालक  हों  गुणवान  तो, होता आत्म  विकास।

मात-पिता   का  नाम हो,कुल को आए   रास।।

कुल  को  आए   रास, बाँधते  सब ही   आशा।

होता   प्रबल  उजास, न  रत्ती कम या    माशा।।

'शुभम् ' वीर जो पुत्र ,  बने अरिदल का घालक।

गुण  ही  सबसे  श्रेष्ठ,गुणी हों यदि सब बालक।।


                         -4-

बालक  गेह- विकास  का, सबल श्रेष्ठ  सोपान।

आगे   बढ़तीं  पीढ़ियाँ, मिले कुलों को   मान।।

मिले  कुलों  को   मान, वही हैं भाग्य  विधाता।

बढ़े  पिता   की  शान,जननि को पुत्र   सुहाता।।

'शुभम्'विटप की शाख,सुकोमल कुल संचालक।

जिधर   मोड़   दो डाल,वही बन जाते  बालक।।


                          -5-

बालक  को  वह सीख दें,जो दे उसको  काम।

उज्ज्वल बना भविष्य को,जपे राम या   श्याम।।

जपे   राम  या  श्याम, करे गुरुजन की   सेवा।

हो  जननी का  नाम, पिता निधि मिस्री   मेवा।।

'शुभम्'  चरित  हो चारु,देश का बन संचालक।

जग   में   हो   विख्यात,  जन्म दें ऐसा  बालक।।


शुभमस्तु !


28.08.2025●9.00प०मा०

                ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...