422/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
वक्त का
घड़ियाल बजता
दो मिनट का खेल सारा।
ऐंठता है
रज्जु-सा तू
बल नहीं कोई बचेगा
खाक में
तब्दील होकर
इतिहास का पन्ना रहेगा
सब धरा
रह जाएगा यों
बह जाएगा सरिता की धारा।
आग के बिन ही
जलाता
देह हड्डी माँस चमड़ा
तू अहं में
फूल कुप्पा
पालता है व्यर्थ लफड़ा
तू मधुरता शून्य
जीवन
सब तुझे लगता है खारा।
पवन के
शीतल झकोरे
देंगे नहीं आनंद तुझको
नाम भी
कोई न लेगा
याद भी आए न जन को
जब बजे
घंटा अनन्तिम
हो विदा ज्यों सर्वहारा।
शुभमस्तु !
11.08.2025●2.00प०मा०
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