397/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
गाँव में
जब शहर आया
आदमी ललचा लुभाया।
सुबह सिंकती हैं
जलेबी
कर रहे बहु
जन कलेवी
जेब में
पैसा नुमाया।
हलवाइयों की
सब दुकानें
सज रहीं
कोई न मानें
खर्च करते हैं
सवाया।
मिल रहा है
खूब ठर्रा
गाँव का
बदला है ढर्रा
प्रथम कुछ
नमकीन खाया।
दूधिया अब
रोशनी है
आदमी अब
सब धनी हैं
खूब खर्चें
जो कमाया।
जींस भी हैं
टॉप भी हैं
रीलबाजी
लाजमी हैं
अब नहीं
कोई उबाया।
शुभमस्तु !
04.08.2025●2.00 प०मा०
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