रविवार, 24 अगस्त 2025

स्वयं बदलाव ही सफलता है [अतुकांतिका]

 464/2025

 

   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चले गए कितने

दुनिया को बदलने वाले

कभी यह भी नहीं सोचा

कि स्वयं ही बदल जाएँ ।


कितने उपदेशी

स्वदेशी विदेशी

संत महात्मा कितने

दे- दे कर उपदेश

चलते बने

ग्रीवा में झाँका न गया।


सभी चाहते हैं

सफल हो जायें

सारी दुनिया को

बदल दें

इतने सबल हो जाएँ!


सफलता 

तुम्हारे भीतर है

कहीं बाहर तो नहीं,

सबको चाहते हो

सुधारना 

अपने को बदलने की

कुव्वत भी नहीं।


झाँको मत उधर 

ताको भी नहीं

इधर न उधर,

सफलता पास ही है

तुम्हारे 

अगर ध्यान से 

देखो तो डगर।


शुभमस्तु !


24.08.2025●8.30आ०मा०

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