रविवार, 3 अगस्त 2025

दो हजार के बाद [ नवगीत ]

 387/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सारी बदल गई है दुनिया

दो हजार के बाद।


लगता महानगर में रहते

लेना एक न देना

दरबे जैसे घर में बसते

अपने अंडे सेना

कोई मरे गिरे उनको क्या

दो हजार के बाद।


बीमारों का हाल 

पूछ लेते थे कभी पड़ौसी

उनकी साली सबकी साली

मौसी भी थी मौसी

ठुकराए जाते पितु जननी

दो हजार के बाद।


मिले अपरिचित भी कोई तब

करते नमन प्रणाम

सिला हुआ ज्यों सबका ही मुख

बात हो गई आम

खुदगर्ज़ी ही नमन कराती

दो हजार के बाद।


चलन सभी छोटे नोटों का

चलती रही चवन्नी

अब सब बड़े नोट चलते हैं

दस सौ नहीं अठन्नी

सोना लाख पार जा पहुँचा

दो हजार के बाद।


दो कौड़ी का मोल नहीं है

मशक हुआ इंसान

मसल दे रहा दो चुटकी से

धूल मिले अरमान

रीलबाज दिखलाएं करतब

दो हजार के बाद।


शुभमस्तु !


02.08.2025●10.00आ०मा०

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