बुधवार, 7 सितंबर 2022

गुड़ को चीनी जान किया 🦚 [ गीतिका ]

 359/2022

   

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✍️शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसने    गुरुजन    का   मान किया।

शुभता      का   सत -  संधान किया।।


मानव    की      पहली     गुरु जननी,

जननी  को   कभी    न  म्लान किया।


पथ     के     तम  -  पुंज   हटा  सारे,

निस्वार्थ    ज्ञान     का     दान किया।


परहित    में     अर्पित      कर जीवन,

शुचि   दान   ज्ञान   को    छान  किया।


भटके        राही     को    मिली   राह,

गुरु     ने     गुड़     चीनी   जान किया।


चेतना        जगाती        चींटी     भी,

पर्वत    चढ़      झंडा   -  गान किया।


ये       'शुभम्'       न     भूले आजीवन,

गुरुजन      से     अमृत  -  पान  किया।।


🪴 शुभमस्तु !


०५.०९.२०२२◆२.१५आरोहणम् मार्तण्डस्य।


गुरुजन - मान 🪷 [ सजल ]

 358/2022

 

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● समांत:  आन।

●पदांत:   किया।

●मात्राभार: 16.

●मात्रा पतन: शून्य।

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✍️शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसने    गुरुजन    का   मान किया।

शुभता      का   सत -  संधान किया।।


मानव    की      पहली     गुरु जननी।

जननी  को   कभी    न  म्लान किया।।


पथ     के     तम  -  पुंज   हटा  सारे।

निस्वार्थ    ज्ञान     का     दान किया।।


परहित    में     अर्पित      कर जीवन।

शुचि   दान   ज्ञान   को    छान  किया।।


भटके        राही     को    मिली   राह।

गुरु     ने     गुड़     चीनी   जान किया।।


चेतना        जगाती        चींटी     भी।

पर्वत    चढ़      झंडा   -  गान किया।।


ये      'शुभम्'       न     भूले आजीवन।

गुरुजन     से     अमृत  -  पान  किया।।


🪴 शुभमस्तु !


०५.०९.२०२२◆२.१५आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 4 सितंबर 2022

सात बजे के बाद 🕖 [ दोहा गीतिका ]

 357/2022

       

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समय -  सूचिका घंटिका, शोभा का  शृंगार।

पानी  भरती   कूप  पर,बाँध कलाई   नार।।


शाला  का घंटा  बजा,किया छात्र  प्रस्थान,

कसी  पेंट घर से चले, पड़ी गाल पर  मार।


भीड़   जमा  मैदान  में, हुई बहुत ही  देर,

नेताजी  आए     नहीं,  घंटे  बीते    चार।।


न्यौता  तो था   चार  का ,बीते घंटे  पाँच,

सात   बजे   के  बाद  ही,आते रिश्तेदार।


शुभ मुहूर्त देखा गया,दिया न थोड़ा ध्यान,

वेला  बीती  शुभ घड़ी, ब्याह न  द्वारचार।


भारतीयता  का   बड़ा, गौरव, गर्व,गुमान,

दुलहन  उठी  न भोर  में, सोई पाँव  पसार।


'शुभम्' ढोल की पोल का, डंका रव घनघोर,

समय -चोर आंनद में, दिखलाते   उपकार।


🪴शुभमस्तु !


०३.०९.२०२२◆८.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।


शनिवार, 3 सितंबर 2022

भाँग में पड़ा कुँआ [ व्यंग्य ]

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✍️ शब्दकार ©

⌚ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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     घड़ी हमारा आभूषण है, शृंगार है।इसके बिना नर- नारी का जीना दुश्वार है।इसीलिए गाँवों की नई दुल्हिनें उसे झाड़ू -पोंछा लगाते समय,पानी भरते समय, दही बिलोते हुए,पालतू पशुओं को चारा पानी करते हुए तथा इसी प्रकार के अन्य सैकड़ों गृह -कार्य निबटाते हुए अपनी कलाई की शोभा बढ़ाने में कभी नहीं चूकतीं।पता नहीं कब घड़ी देखने की आवश्यकता पड़ जाए? बिना पढ़ी - लिखियों को तो औऱ भी ज्यादा जरूरत है ,ताकि देखने वाले उन्हें सुशिक्षित समझें।भले ही घड़ी देखना नहीं आता हो। घड़ी हमारा एक अनिवार्य शृंगार है।तभी तो उसे मोबाइल ,टीवी, लैपटॉप,कंप्यूटर और बहुत से खिलौनों आदि में  दिया जाने लगा है। क्योंकि बच्चों को भी तो समय देखने की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए निर्माताओं ने सबका ध्यान  रखा है।हम सभी समय  -  प्रिय नागरिक जो हैं।

    यह तो हुई घड़ी की बात।अब आते हैं समय की प्रियता पर।हमारे देशवासियों की घुट्टी में यह घोल -घोल कर पिलाया जाता है कि कहीं भी समय से मत पहुंचना। यदि  भूल से भी समय से जा पहुँचे तो नेता को सुनने-  देखने के लिए भीड़ नहीं मिलेगी।इसलिए नेताजी का अटल नियम है कि चार -छः  घण्टे विलम्ब से ही जाओ।अन्यथा तुम्हारे नारे और जयकारे कौन लगाएगा।भीड़ है तो नेता है ,अन्यथा उसे भला कौन पूछता है!  इस प्रकार नेता का विलम्ब से पहुंचना एक नियम बन गया। अब जनता भी कम होशियार नहीं। वही पहले जाकर क्यों धूप  और धूल खाए? इसलिए टेंट ,माला, माइक लगाने वालों को छोड़कर वह भी आराम से सविलम्ब ही पहुँचती है। औऱ यदि सौभाग्य से आ भी गए तो उनके जाने तक भी आने वालों का तांता समाप्त नहीं होता। नेताजी तो अपने गुर्गों से मोबाइल से भीड़ का जायज़ा पहले से ही लेते रहते हैं कि हाँ भाई गुप्ता जी  कितने लोग आ गए ? उनकी सूचना पर ही नेताजी का कार या हेलीकॉप्टर का चालक आहूत किया जाता है कि अब चलें।मैदान भर गया है।

     नेताजी के सम्बंध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यदि वे समय से पहुँच गए तो उन्हें छोटा नेता माना जाता है। बड़ा नेता वही है जो या तो जनता को दिन में ही  प्रतीक्षा के  बड़े- बड़े तारे गिनवा दे  अथवा छह घण्टे बाद न आने वाली ट्रेन की तरह सूचना भेज दे कि नेता जी अन्यत्र व्यस्त हैं,इसलिए आने का कार्यक्रम रद्द कर दिया है। अब जनता गाली दे,तो देती रहे। जिस नेता को जितनी गालियां मिलती हैं, वह उनके लिए च्यवनप्राश की तरह यौवन वर्द्धक ही होता है। वह गाली प्रूफ जो होता है।

     स्कूल कालेज में पढ़ने जाते समय प्रायः वे विद्यार्थी जिनका घर संस्था के समीप ही स्थित होता है,घर से तब निकलते हैं ,जब चपरासी का घंटा  टन - टन की ध्वनि के साथ उन्हें आमंत्रित करने लगता है। कुछ अध्यापक तो अपना खेत जोतकर या दुकान चलाकर तब जाते हैं ,जब उनका पीरियड निकल चुका होता है। परंतु उन्हें इसका कोई गिला -शिकवा नहीं ।क्योंकि कोई भी देखने, सुनने औऱ कहने वाला ही नहीं  तो नई बहू भी तब उठती है ,जब सूरज की किरणें उसकी खिड़की में पैर पसारने लगती हैं।चिड़ियों का मादक संगीत उन्हें आहूत करने लगता है कि अब तो उठ जाओ। मुर्गे ने तो कब से बांग लगा- लगा कर थक हार कर बोलना बंद कर दिया। 

     शादी विवाह के निमंत्रण पत्रों में प्रतिभोज का समय 3 या 4 बजे का छपवाया जाता है,लेकिन शाम सात बजे से पहले जीमने वाले नहीं जाते। इससे भी उनका महत्व बढ़ता है।ज्यादा बड़े लोग तो केवल पाँच मिनट के लिए खुशबू सूँघने जाते हैं।उनके न खाने के कई रहस्यपूर्ण कारण हो सकते हैं। लेकिन हमें और आपको इससे क्या लेना- देना कि नेताजी ने क्यों नहीं भोजन किया? खाएँ तो ठीक और नहीं खाएँ तो भी ठीक। यदि नेताजी की राजनीति हमारी आपकी  समझ में आ जाए  तो उसकी नेतागिरी बेकार औऱ राजनीति दो कौड़ी न हो जाएगी?

     इस स्थान पर यह भी बतला देना परम् आवश्यक है कि एक  आध अँगुलियों के पोरों पर गिना जाने वाला स्थान ऐसा भी है ,जहाँ हम भारतीय बेचारों को समय से पहुंचना ही पड़ता है। जैसे ट्रेन छूटने के भय से स्टेशन पर, राशन या अन्य अंध रेवड़ी जैसी  चीज ख़त्म न हो जाए,इसलिए वितरण स्थल पर ,मुफ्त वितरण स्थल पर समय से नहीं ,समय -पूर्व जा धमकना हमारा स्वभाव है । प्रकृति है। सुकृति है। यह सभी स्थल भारतीय जन मानस की बेचारगी के सशक्त प्रमाण हैं ।इसीलिए तो हम भारतीय धन्य हैं और अपनी पीठ अपने आप थपथपाने में नहीं चूकते,नहीं थकते।

     हमारे देश में मुहूर्त देखने  और पत्रा देखने का विशेष पवित्र संस्कार है। शुभ मुहूर्त के अनुसार तेल,ताई, लग्न,भाँवर आदि संस्कारों को नियोजित किया जाता है।किंतु कोई भी शुभ कार्य करते समय उसे विस्मृत कर उसे उठाकर ताक पर सजा दिया जाता है।सभी कार्य घर वालों की मनमर्जी से सुविधानुसार किये जाते हैं।समय के  महत्त्व को ताड़ के पेड़ पर टाँगने के चाहे जो नतीजे हों ,लेकिन उसका विवाह ,शादी, गृह- प्रवेश, दुकान आदि के मुहूर्त, उद्घाटन आदि में कोई भी महत्त्व नहीं माना जाता। भारतीय समय- प्रियता के कारण भारतीय- समय(आई एस टी) एक सजीला मज़ाक बनकर रह गया है। बना रहे। जो समय को नष्ट करता है, समय भी अपनी करनी में नहीं चूकता। देश के मुहूर्त, पत्रा, कुंडली, सब का ऐसा घालमेल देश के वासियों की छवि में चार नहीं , चार सौ चालीस चाँद से चमका रहा है।हमें ऐसे ही भारतीय होने पर गर्व करने  का परामर्श ही नहीं दिया जाता ,हमें फूलकर कुप्पा होने के लिए भी प्रेरित किया जाता है। कुएँ में भाँग नहीं पड़ी ,भाँग में कुँआ पड़ा हुआ है।


🪴 शुभमस्तु!

०३.०९.२०२२◆५.३०

पतनम मार्तण्डस्य।

⏰⏰⏰⏰⏰⏰⏰⏰⏰

चोरी का गुड़ ज्यादा मीठा ! [ व्यंग्य ]

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 ✍️ शब्दकार © 

 🌴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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 मेरा विचार है कि 'असंतोष' आदमी का पर्यायवाची शब्द होना चाहिए।इस धरती पर आदमी के विकास, प्रगति, समृद्धि, अति समृद्धि,अपार समृद्धि ,अकूत समृद्धि,ख्याति ,कुख्याति जैसी विषज्ञताओं के पीछे उसका 'असंतोष'ही है। यदि उसे अपने धन- संपत्ति, व्यवसाय,नौकरी, घर,मकान, दुकान ,होटल,कारखाने आदि से संतोष होता ,तो आज संसार का नक्शा कुछ और ही होता।

 कहावत है कि चोरी का गुड़ कुछ ज्यादा ही मीठा होता है। इसीलिए कोई नमक की चोरी नहीं करता।उसके भरे हुए बड़े-बड़े बोरे दुकान बंद करने कर बाद भी उसे बाहर पड़े छोड़ दिए जाते हैं ;किंतु गुड़ की एक भी भेली बाहर नहीं छोड़ी जाती।उसकी चोरी होने का खतरा जो है,इसलिए उसे तालों में बंद करके सुरक्षित रखा जाता है। परंतु जिन्हें चोरी का गुड़ खाने का चसका लग चुका होता है ,वे उसे चुराने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं।

 दूसरे की बीबी और दूसरे की कमाई सबको ज्यादा सुंदर और बेहतर लगती है।उसके मन में अपने से तुलना का भाव निरंतर जागता रहता है।इस तुलनात्मक भाव का परिणाम यही होता है कि उसे वे बेहतर ही लगते हैं।इसलिए उसे चोरी - चोरी देखने या हिम्मत हो तो चुराने की हिम्मत करके अपने असंतोष को संतोष में बदल लेता है।स्व - आय से भी प्यारी 'अन्य -आय' के अर्जन को वह अन्याय नहीं मानता। अपने को तोलने- नापने के उसके पैमाने अलग -अलग हैं। इसलिए प्रेमपूर्वक उत्कोच स्वीकार कर तिजोरियों में नहीं, वरन तहखानों ,कमरों ,शौचालयों, दीवारों आदि में सुरक्षित रखता हैं।वह भूल जाता है कि जब पड़ेगा छापा, तब याद आएंगे बापा। 

नित्य निरंतर चर्चा में आने वाले गबनी, चोर ,डकैत, मिलावटी, कम नाप - तौल कर व्यवसाय करने वालों से टीवी, अख़बार सोशल मीडिया आदि चटखारे ले लेकर उनका प्रचार करते देखे जाते हैं ,जो अन्य भावी असन्तोषी जन के लिए प्रेरणा का स्रोत बनते हैं।अपने क्रय किए गए खेत या प्लॉट से बाहर फ़सल उगाना या अतिक्रमण कर मकान दुकान का निर्माण करना,दूसरे कृषक की मेड़ या खेत जोत लेना इस 'असन्तोषी' की साहसपूर्ण शान की बात मानी जाती है। गुड़ तो वैसे भी स्वाभाविक रूप से मीठा ही होता है ,किन्तु यदि चुराकर मिले तो क्या कहने !चोरी के गुड़ की मिठास कई गुणा बढ़ जाती है।उत्कोच लेने वाला उत्कोच देकर मुक्ति पा लेता है।100 करोड़ के उत्कोच की मुक्ति की कीमत दस बीस करोड़ से भी ज्यादा क्या होगी? जब काजल की कोठरी में सब काजल - ब्रांड ही निवास करते हैं तो क्या राजनेता औऱ क्या अन्य अधिकारी ? सबको एक ही बीमारी : 'अन्य -आय' ,चोरी का गुड़ । फिर क्या कुछ दिन के ड्रामे के बाद पटाक्षेप ।गोबर के ऊपर मोटी- मोटी क्रीम का सुगंधित इत्रमय लेप।फाइनल रिपोर्ट।केस क्लोज्ड।

  रग -रग में बहता हुआ भ्रष्टाचार का रक्त ,घोषित कर रहा है ऐसों को महान देश भक्त।फिर क्यों न हों भावी कर्णधार उन पर अनुरक्त। आगे  गुरु ,पीछे - पीछे चेला। इन्हीं तो फल फूल रहा है देश भर में मेला। जिस देश के तथाकथित 'भक्तों' को तीन दिन को तिरंगा आदेश तीस दिन तक भी स्मरण न रहे , उनसे चोरी के गुड़ की अपेक्षा ही की जा सकती है। उनका आजादी का मतलब अब समझ में आ गया है। पूरा देश इस परीक्षा में फेल हो गया है। इसीलिए फटे, मैले बेहिसाब झंडे उनके ट्रैक्टरों, छतों, बाइकों, कारों,ट्रकों,वाटर टैंकों पर लहरा -फहरा रहे हैं। क्या यही राष्ट्र ध्वज का उचित सम्मान है ? यह भी चोरी का गुड़ ही है ,जो उन्हें महान राष्ट्र भक्त होने का स्वाद दे रहा है।  अब यह सत्य भी उजागर हो गया है कि ये देश इतने वर्षों तक क्यों गुलाम रहा ? जब सारे कुओं में ही भाँग घुली हुई है ,तो नशे से बचा भी कैसे जा सकता है। गुड़ ,वह भी भाँग वाला , सोने में सुहागा सिद्ध हो रहा है।

 'भ्रष्टाचार के हीमोग्लोबिन' के बिना 'असंतोषी' के जीवन की कल्पना भी कैसे की जा सकती है! नस - नस में बहने वाला ये हीमोग्लोबिन ही तो उसके बनाए रखने का मुख्य तत्त्व है। इसे बाजार से खरीदा नहीं जाता।कहना यह चाहिए कि बाजार ही हीमोग्लोबिन का है।यत्र -तत्र - सर्वत्र वही छाया हुआ है।ईमानदारी की पूँछ नहीं है। मूँछ तो हीमोग्लोबिन ने ही सूपड़ा साफ कर दी है।ईमानदारी की छूँछ अवश्य कहीं -कहीं दिखाई दे जाती है। और छूँछ का कोई अर्थ नहीं होता।इस हीमोग्लोबिन में गुड़ की भेली की मिठास से मधुमेह भी नहीं होता।बल्कि देह की सुर्खी में कई गुणा वृद्धि ही होती है।स्वदेश के पर चौर गुड़ प्रेमियों को धन्य -धन्य है कि भ्रष्टाचार के ग्राफ के उच्चीकरण के स्केल पर वे विश्व पटल पर सर्वोच्च स्थान पर अग्रसर होने के लिए निरन्तर अपने चरण बढ़ाते हुए देखे जा रहे हैं। 

 🪴 शुभमस्तु! ०२.०९.२०२२◆११.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

 🪗🪗🪗🪗🪗🪗🪗🪗🪗 


गुरुवार, 1 सितंबर 2022

चोरी का गुड़! 🙊 [ अतुकांतिका ]

 354/2022

         

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✍️ शब्दकार ©

🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अतिक्रमण 

आचार का,

व्यवहार का,

सुविचार का,

दीवार का,

निज माप का,

या आपका,

अच्छा नहीं होता।


संतुष्टि 

मात्र कुछ अवधि की,

इसके बाद ??

विकृत नियति की,

विचार पहले ही

करना अत्यावश्यक था,

पर नहीं ,

विवेकशील मानव

खो बैठा विवेक अपना,

देखता हुआ

भविष्य का

मिथ्या सपना,

राम-राम जपना,

पराया माल अपना।


कच्ची मृत्तिका 

निर्मित ईंट से

अट्टालिकाएँ नहीं बनती,

उसे भट्टे के आग में

तपना ही पड़ता है,

तब कहीं जाकर

नींव का आधार

सुदृढ़ बनता है।


लेकिन क्यों है

सोच मानव की कच्ची?

जो तात्कालिक लाभ हेतु

खा जाता है गच्ची!

वस्तुतः उसकी

 दूरदर्शिता है टुच्ची,

जैसे किसी

 छोटे बालक की

घरोंदों की उम्र बच्ची,

बात तो

 यही है सच्ची।


बचता है अंत में

मात्र प्रायश्चित,

जब हो ही जाता है

चारों खाने चित्त,

चोरी का गुड़

कुछ ज्यादा ही

मीठा होता है।

आँसू नहीं गिरते बाहर

भीतर ही भीतर 

पीता है,

घुट -घुट कर 

रोता है,

पर अब क्या!

चुग जाती हैं

जब खेत चिड़ी

फिर पछताने से भी

क्या होता है?


🪴 शुभमस्तु!


०१.०९.२०२२◆८.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

गहरी बड़ी कहानी 🙉 [ गीत ]

 353/2022

  

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✍️ शब्दकार ©

⛲ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समझ  रखा था  मैंने  उनको,

सच  के  वे  रखवाले।


एक - एक   की  पूँछ   उठाई,

निकले   बड़े  निराले,

उड़े  मुखौटे  जब   मुखड़े  से,

पड़े  जुबाँ  पर  ताले,

मिला  दूध  में पानी,

गहरी बड़ी  कहानी,

उर   से   गए   निकाले।


गगन  चूमती    मीनारों   को,

देख -  देख   दहलाए,

कितना  बहा  पसीना  होगा,

सोच   बहुत   चकराए,

संपति  थी   या  पानी,

समझ  न आया मानी,

आफत  के  परकाले।


सरकारी   जमीन  पर अपना,

कब्जा   कर  हथियाया,

महल दुमहला बहु मंजिल का

ऊँचा    ठाठ    सजाया,

सजीं    दुकानें    ऊँची,

गगन  तनी मुछ - कूँची,

खाते  स्वर्ण -  निवाले।


सच को सच होते जब पाया,

खुलीं  नींद   से  आँखें,

जो चिकना-चुपड़ा दिखता है,

मिटती   देखीं    शाखें,

गोबर     को    चमकाया,

आज  समझ  में   आया,

फूट   गए  पग -  छाले।


🪴 शुभमस्तु !


०१.०९.२०२२◆४.१५ 

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...